Author Topic: आ हा रे म्यर गेवाड़  (Read 2064 times)

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आ हा रे म्यर गेवाड़
« on: October 27, 2011, 12:31:57 PM »
गेवाड़
गेवाड़ की सान रामगंगा,
जाँ देवाताउक थान छा.
अगनेरी की माईथान,
 जो बनानी एक  महान छा.
 लखनपुर कतुरी राजा,
 जो गेवाड  सान छा,
मासी बतिक चौखुटि तक,
जाँ हरी भरी सार छा .
हे ! मेरा गेवाड़क देवताओ,
 तुमुकं हमर परणाम छा.
मासी का भूमियाँ देवा,
 जो भक्तुक भगवान छा.
कृपा करिया हे !
  गेवाड तू  हमरी  शान छा......
by पं. भास्कर जोशी
« Last Edit: January 07, 2012, 07:36:52 PM by Administrator »
पं. भास्कर जोशी

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Re: आ हा रे म्यर गेवाड़
« Reply #1 on: October 28, 2011, 12:01:02 PM »
गेवाड़
गेवाड़ की सान रामगंगा,जाँ देवाताउक थान छा.
अगनेरी की माईथान, जो बनानी एक  महान छा.
 लखनपुर कतुरी राजा जो गेवाड  सान छा,
मासी बतिक चौखुटि तक, जाँ हरी भरी सार छा .
हे ! मेरा गेवाड़क देवताओ तुमुकं हमर परणाम छा.
मासी का भूमियाँ देवा जो भक्तुक भगवान छा.
कृपा करिया हे !   गेवाड तू  हमरी  शान छा......
पं. भास्कर जोशी

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Re: आ हा रे म्यर गेवाड़
« Reply #1 on: October 28, 2011, 12:01:02 PM »

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Re: कुमाँऊ का संक्षिप्त इतिहास
« Reply #2 on: October 28, 2011, 12:02:48 PM »
कुमाँऊ का संक्षिप्त इतिहास

कुमाँऊ शब्द की उत्पत्ति कुर्मांचल से हुई है जिसका मतलब है कुर्मावतार (भगवान विष्णु का कछुआ रूपी अवतार) की धरती। कुमाँऊ मध्य हिमालय में स्थित है, इसके उत्तर में हिमालय, पूर्व में काली नदी, पश्चिम में गढ‌वाल और दक्षिण में मैदानी भाग। इस क्षेत्र में मुख्यतया ‘कत्यूरी’ और ‘चंद’ राजवंश के वंशजों द्धारा राज्य किया गया। उन्होंने इस क्षेत्र में कई मंदिरों का भी निर्माण कियाजो आजकल सैलानियों (टूरिस्ट) के आकर्षण का केन्द्र भी हैं। कुमाँऊ का पूर्व मध्ययुगीन इतिहास ‘कत्यूरी’ राजवंश का इतिहास ही है, जिन्होंने 7 वीं से 11 वीं शताब्दी तक राज्य किया। इनका राज्य कुमाँऊ, गढ‌वाल और पश्चिम नेपाल तक फैला हुआ था। अल्मोड‌ा शहर के नजदीक स्थित खुबसूरत जगह बैजनाथ इनकी राजधानी और कला का मुख्य केन्द्र था। इनके द्धारा भारी पत्थरों से निर्माण करवाये गये मंदिर वास्तुशिल्पीय कारीगरी की बेजोड‌ मिसाल थे। इन मंदिरों में से प्रमुख है ‘कटारमल का सूर्य मंदिर’ (अल्मोडा शहर के ठीक सामने, पूर्व के ओर की पहाड‌ी पर स्थित)। 900 साल पूराना ये मंदिर अस्त होते ‘कत्यूरी’ साम्राज्य के वक्त बनवाया गया था।
कुमाँऊ में ‘कत्यूरी’ साम्राज्य के बाद पिथौरागढ‌ के ‘चंद’ राजवंश का प्रभाव रहा। जागेश्वर का प्रसिद्ध शिव मंदिर इन्ही के द्धारा बनवाया गया था, इसकी परिधि में छोटे बड‌े कुल मिलाकर 164 मंदिर हैं।
ऐसा माना गया है कि ‘कोल’ शायद कुमाँऊ के मूल निवासी थे, द्रविडों से हारे जाने पर उनका कोई एक समुदाय बहुत पहले कुमाँऊ आकर बस गया। आज भी कुमाँऊ के शिल्पकार उन्हीं ‘कोल’ समुदाय के वंशज माने जाते हैं। बाद में ‘खस’ समुदाय के काफी लोग मध्य एशिया से आकर यहाँ के बहुत हिस्सों में बस गये। कुमाँऊ की ज्यादातर जनसंख्या इन्हीं ‘खस’ समुदाय की वंशज मानी जाती है। ऐसी कहावत है कि बाद में ‘कोल’ समुदाय के लोगों ने ‘खस’ समुदाय के सामने आत्मसमर्फण कर इनकी संस्कृति और रिवाज अपनाना शुरू कर दिया होगा। ‘खस’ समुदाय के बाद कुमाँऊ में ‘वैदिक आर्य’ समुदाय का आगमन हुआ। स्थानीय राजवंशों के इतिहास की शुरूआत के साथ ही यहाँ के ज्यादातर निवासी भारत के तमाम अलग अलग हिस्सों से आये ‘सवर्ण या ऊंची जात’ से प्रभावित होने लगे। आज के कुमाँऊ में ब्राह्मण, राजपूत, शिल्पकार, शाह (कभी अलग वर्ण माना जाता था) सभी जाति या वर्ण के लोग इसका हिस्सा हैं। संक्षेप में, कुमाँऊ को जानने के लिये हमेशा निम्न जातियों या समुदाय का उल्लेख किया जायेगा – शोक्य या शोक, बंराजिस, थारू, बोक्स, शिल्पकार, सवर्ण, गोरखा, मुस्लिम, यूरोपियन (औपनिवेशिक युग के समय), बंगाली, पंजाबी (विभाजन के बाद आये) और तिब्बती (सन् 1960 के बाद)।
6वीं शताब्दी (ए.डी) से पहले -   क्यूनीनदास या कूनीनदास   6वीं शताब्दी (ए.डी) के दौरान -   खस, नंद और मौर्य। ऐसी मान्यता है बिंदुसार के शासन के वक्त खस समुदाय द्धारा की गई बगावत अशोक द्धारा दबा दी गई। उस वक्त पुरूष प्रधान शासन माना जाता है। 633-643 ए.डी के दौरान यूवान च्वांग (ह्वेन-टीसेंग) के कुमाँऊ के कुछ हिस्सों का भ्रमण किया और उसने स्त्री राज्य का भी उल्लेख किया। ऐसा माना जाता है कि यह गोविशाण (आज का काशीपूर) क्षेत्र रहा होगा। कुमाँऊ के कुछ हिस्सों में उस वक्त ‘पौरवों’ ने भी शासन किया होगा।   6वी से 12वी शताब्दी (ए.डी) - इस दौरान कत्यूरी वंश ने सारे कुमाँऊ में शासन किया। 1191 और 1223 के दौरान दोती (पश्चिम नेपाल) के मल्ल राजवंश के अशोका मल्ल और क्रचल्ला देव ने कुमाँऊ में आक्रमण किया। कत्यूरी वंश छोटी छोटी रियासतों में सीमित होकर रह गया।   12वी शताब्दी (ए.डी) से -   चंद वंश के शासन की शुरूआत। चंद राजवंश ने पाली, अस्कोट, बारामंडल, सुई, दोती, कत्यूर द्धवाराहाट, गंगोलीहाट, लाखनपुर रियासतों में अधिकार कर अपने राज्य में मिला ली।   1261 – 1275 -   थोहर चंद   1344 – 1374 या 1360 – 1378 -   अभय चंद। कुछ ताम्रपत्र मिले जो चंद वंश के अलग अलग शासकों से संबन्धित थे लेकिन शासकों के नाम का पता नही चल पाया।   1374 – 1419 (ए.डी) - गरूड़ ज्ञानचंद   1437 – 1450 (ए.डी) -   भारती चंद   1565 – 1597 (ए.डी) -   रूद्र चंद   1597 – 1621 (ए.डी) -   लक्ष्मी चंद। चंद शासकों के दौरान नये शहरों की स्थापना और इनका विकास भी हुआ जैसे रूद्रपुर, बाजपुर, काशीपुर। 1779 – 1786 (ए.डी) -   कुमाँऊ के परमार राजकुमार, प्रद्धयुमन शाह ने प्रद्धयुमन चंद के नाम से राज्य किया और अंततः गोरखाओं के साथ खुरबुरा (देहरादून) के युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुआ।   1788 – 1790 (ए.डी) -   महेन्द्र सिंह चंद, ऐसा माना जाता है कि यह चंद वंश का अंतिम शासक था। जिसने राजबुंगा (चंपावत) से शासन किया लेकिन बाद में अल्मोड‌ा से किया।   1790 – 1815 (ए.डी) -   कुमाँउ में गोरखाओं का राज्य रहा। गोरखाओं के निर्दयता और जुल्म से भरपूर शासन में चंद वंश के शासकों का पूरा ही नाश हो गया।   1814 – 1815 (ए.डी) -   नेपाल युद्ध। ईस्ट इंडिया कम्पनी ने गोरखाओं को पराजित कर कुमाऊँ में राज्य करना शुरू किया।
यदपि ब्रिटिश राज्य गोरखाओं (जिसको गोरख्योल कहा जाता था) से कम निर्दयता पूर्ण और बेहतर था लेकिन फिर भी ये विदेशी राज्य था। लेकिन फिर भी ब्रिटिश राज्य के दौरान ही कुमाँऊ में प्रगति की शुरूआत भी हुई। इसके बाद, कुमाँऊ में भी लोग विदेशी राज्य के खिलाफ उठ खड‌े हुए।
« Last Edit: October 28, 2011, 03:43:24 PM by पं. भास्कर जोशी »
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म्यर गेवाड़ घाटी की अमर प्रेम कथा

        यह कहानी कोई हज़ार साल पुरानी है, कुमांऊं के पहले राजवंश कत्‍यूर के किसी वंशज को लेकर यह कहानी है, उस समय कत्‍यूरों की राजधानी बैराठ वर्तमान चौखुटिया थी। जनश्रुतियों के अनुसार बैराठ में तब राजा दुलाशाह शासन करते थे, उनकी कोई संतान नहीं थी, इसके लिए उन्‍होंने कई मनौतियां मनाई। अन्‍त में उन्‍हें किसी ने बताया कि वह बागनाथ (बागेश्वर) में शिव की अराधना करे तो उन्‍हें संतान की प्राप्‍ति हो सकती है। वह बागनाथ के मंदिर गये वहां उनकी मुलाकात भोट के व्‍यापारी सुनपत शौका और उसकी पत्‍नी गांगुली से हुई, वह भी संतान की चाह में वहां आये थे। दोनों ने आपस में समझौता किया कि यदि संतानें लड्का और लड्की हुई तो उनकी आपस में शादी कर देंगें। ऐसा ही हुआ भगवान बागनाथ की कृपा से बैराठ के राजा का पुत्र हुआ, उसका नाम मालूशाही रखा गया। सुनपत शौका के घर में लडकी हुई, उसका नाम राजुला रखा गया। समय बीतता गया, जहां बैराठ में मालू बचपन से जवानी में कदम रखने लगा वहीं भोट में राजुला का सौन्‍दर्य लोगों में चर्चा का विषय बन गया। वह जिधर भी निकलती उसका लावण्‍य सबको अपनी ओर खींचता था।
 
पुत्र जन्म के बाद राजा दोलूशाही ने ज्योतिषी को बुलाया और बच्चे के भाग्य पर विचार करने को कहा। ज्योतिषी ने बताया कि “हे राजा! तेरा पुत्र बहुरंगी है, लेकिन इसकी अल्प मृत्यु का योग है, इसका निवारण करने के लिये जन्म के पांचवे दिन इसका ब्याह किसी नौरंगी कन्या से करना होगा।” राजा ने अपने पुरोहित को शौका देश भेजा और उसकी कन्या राजुला से ब्याह करने की बात की, सुनपति तैयार हो गये और खुशी-खुशी अपनी नवजात पुत्री राजुला का प्रतीकात्मक विवाह मालूशाही के साथ कर दिया। लेकिन विधि का विधान कुछ और था, इसी बीच राजा दोलूशाही की मृत्यु हो गई। इस अवसर का फायदा दरबारियों ने उठाया और यह प्रचार कर दिया कि जो बालिका मंगनी के बाद अपने ससुर को खा गई, अगर वह इस राज्य में आयेगी तो अनर्थ हो जायेगा। इसलिये मालूशाही से यह बात गुप्त रखी जाये।
 
धीरे-धीरे दोनों जवान होने लगे….राजुला जब युवा हो गई तो सुनपति शौका को लगा कि मैंने इस लड़की को रंगीली वैराट में ब्याहने का वचन राजा दोलूशाही को दिया था, लेकिन वहां से कोई खबर नहीं है, यही सोचकर वह चिंतित रहने लगा।
एक दिन राजुला ने अपनी मां से पूछा कि
 
” मां दिशाओं में कौन दिशा प्यारी?
पेड़ों में कौन पेड़ बड़ा, गंगाओं में कौन गंगा?
देवों में कौन देव? राजाओं में कौन राजा और देशों में कौन देश?”
 
उसकी मां ने उत्तर दिया ” दिशाओं में प्यारी पूर्व दिशा, जो नवखंड़ी पृथ्वी को प्रकाशित करती है, पेड़ों में पीपल सबसे बड़ा, क्योंकि उसमें देवता वास करते हैं। गंगाओं में सबसे बड़ी भागीरथी, जो सबके पाप धोती है। देवताओं में सबसे बड़े महादेव, जो आशुतोष हैं। राजाओं में राजा है राजा रंगीला मालूशाही और देशों में देश है रंगीली वैराट”
 
तब राजुला धीमे से मुस्कुराई और उसने अपनी मां से कहा कि ” हे मां! मेरा ब्याह रंगीले वैराट में ही करना। इसी बीच हूण देश का राजा विक्खीपाल सुनपति शौक के यहां आया और उसने अपने लिये राजुला का हाथ मांगा और सुनपति को धमकाया कि अगर तुमने अपनी कन्या का विवाह मुझसे नहीं किया तो हम तुम्हारे देश को उजाड़ देंगे। इस बीच में मालूशाही ने सपने में राजुला को देखा और उसके रुप को देखकर मोहित हो गया और उसने सपने में ही राजुला को वचन दिया कि मैं एक दिन तुम्हें ब्याह कर ले जाऊंगा। यही सपना राजुला को भी हुआ, एक ओर मालूशाही का वचन और दूसरी ओर हूण राजा विखीपाल की धमकी, इस सब से व्यथित होकर राजुला ने निश्च्य किया कि वह स्व्यं वैराट देश जायेगी और मालूशाही से मिलेगी। उसने अपनी मां से वैराट का रास्ता पूछा, लेकिन उसकी मां ने कहा कि बेटी तुझे तो हूण देश जाना है, वैराट के रास्ते से तुझे क्या मतलब। तो रात में चुपचाप एक हीरे की अंगूठी लेकर राजुला रंगीली वैराट की ओर चल पड़ी।
 
वह पहाड़ों को पारकर मुनस्यारी और फिर बागेश्वर पहुंची, वहां से उसे कफू पक्षी ने वैराट का रास्ता दिखाया। लेकिन इस बीच जब मालूशाही ने शौका देश जाकर राजुला को ब्याह कर लाने की बात की तो उसकी मां ने पहले बहुत समझाया, उसने खाना-पीना और अपनी रानियों से बात करना भी बंद कर दिया। लेकिन जब वह नहीं माना तो उसे बारह वर्षी निद्रा जड़ी सुंघा दी गई, जिससे वह गहरी निद्रा में सो गया। इसी दौरान राजुला मालूशाही के पास पहुंची और उसने मालूशाही को उठाने की काफी कोशिश की, लेकिन वह तो जड़ी के वश में था, सो नहीं उठ पाया, निराश होकर राजुला ने उसके हाथ में साथ लाई हीरे की अंगूठी पहना दी और एक पत्र उसके सिरहाने में रख दिया और रोते-रोते अपने देश लौट गई। सब सामान्य हो जाने पर मालूशाही की निद्रा खोल दी गई, जैसे ही मालू होश में आया उसने अपने हाथ में राजुला की पहनाई अंगूठी देखी तो उसे सब याद आया और उसे वह पत्र भी दिखाई दिया जिसमें लिखा था कि ” हे मालू मैं तो तेरे पास आई थी, लेकिन तू तो निद्रा के वश में था, अगर तूने अपनी मां का दूध पिया है तो मुझे लेने हूण देश आना, क्योंकि मेरे पिता अब मुझे वहीं ब्याह रहे हैं।” यह सब देखकर राजा मालू अपना सिर पीटने लगे, अचानक उन्हें ध्यान आया कि अब मुझे गुरु गोरखनाथ की शरण में जाना चाहिये, तो मालू गोरखनाथ जी के पास चले आये।
 
गुरु गोरखनाथ जी धूनी रमाये बैठे थे, राजा मालू ने उन्हें प्रणाम किया और कहा कि मुझे मेरी राजुला से मिला दो, मगर गुरु जी ने कोई उत्तर नहीं दिया। उसके बाद मालू ने अपना मुकुट और राजसी कपड़े नदी में बहा दिये और धूनी की राख को शरीर में मलकर एक सफेद धोती पहन कर गुरु जी के सामने गया और कहा कि हे गुरु गोरखनाथ जी, मुझे राजुला चाहिये, आप यह बता दो कि मुझे वह कैसे मिलेगी, अगर आप नहीं बताओगे तो मैं यही पर विषपान करके अपनी जान दे दूंगा। तब बाबा ने आंखे खोली और मालू को समझाया कि जाकर अपना राजपाट सम्भाल और रानियों के साथ रह। उन्होंने यह भी कहा कि देख मालूशाही हम तेरी डोली सजायेंगे और उसमें एक लडकी को बिठा देंगे और उसका नाम रखेंगे, राजुला। लेकिन मालू नहीं माना, उसने कहा कि गुरु यह तो आप कर दोगे लेकिन मेरी राजुला के जैसे नख-शिख कहां से लायेंगे? तो गुरु जी ने उसे दीक्षा दी और बोक्साड़ी विद्या सिखाई, साथ ही तंत्र-मंत्र भी दिये ताकि हूण और शौका देश का विष उसे न लग सके।
 
तब मालू के कान छेदे गये और सिर मूड़ा गया, गुरु ने कहा, जा मालू पहले अपनी मां से भिक्षा लेकर आ और महल में भिक्षा में खाना खाकर आ। तब मालू सीधे अपने महल पहुंचा और भिक्षा और खाना मांगा, रानी ने उसे देखकर कहा कि हे जोगी तू तो मेरा मालू जैसा दिखता है, मालू ने उत्तर दिया कि मैं तेरा मालू नहीं एक जोगी हूं, मुझे खान दे। रानी ने उसे खाना दिया तो मालू ने पांच ग्रास बनाये, पहला ग्रास गाय के नाम रखा, दूसरा बिल्ली को दिया, तीसरा अग्नि के नाम छोड़ा, चौथा ग्रास कुत्ते को दिया और पांचवा ग्रास खुद खाया। तो रानी धर्मा समझ गई कि ये मेरा पुत्र मालू ही है, क्योंकि वह भी पंचग्रासी था। इस पर रानी ने मालू से कहा कि बेटा तू क्यों जोगी बन गया, राज पाट छोड़कर? तो मालू ने कहा-मां तू इतनी आतुर क्यों हो रही है, मैं जल्दी ही राजुला को लेकर आ जाऊंगा, मुझे हूणियों के देश जाना है, अपनी राजुला को लाने। रानी धर्मा ने उसे बहुत समझाया, लेकिन मालू फिर भी नहीं माना, तो रानी ने उसके साथ अपने कुछ सैनिक भी भेज दिये।
 
मालूशाही जोगी के वेश में घूमता हुआ हूण देश पहुंचा, उस देश में विष की बावडियां थी, उनका पानी पीकर सभी अचेत हो गये, तभी विष की अधिष्ठात्री विषला ने मालू को अचेत देखा तो, उसे उस पर दया आ गई और उसका विष निकाल दिया। मालू घूमते-घूमते राजुला के महल पहुंचा, वहां बड़ी चहल-पहल थी, क्योंकि विक्खी पाल राजुला को ब्याह कर लाया था। मालू ने अलख लगाई और बोला ’दे माई भिक्षा!’ तो इठलाती और गहनों से लदी राजुला सोने के थाल में भिक्षा लेकर आई और बोली ’ले जोगी भिक्षा’ पर जोगी उसे देखता रह गया, उसे अपने सपनों में आई राजुला को साक्षात देखा तो सुध-बुध ही भूल गया। जोगी ने कहा- अरे रानी तू तो बड़ी भाग्यवती है, यहां कहां से आ गई? राजुला ने कहा कि जोगी बता मेरी हाथ की रेखायें क्या कहती हैं, तो जोगी ने कहा कि ’मैं बिना नाम-ग्राम के हाथ नहीं देखता’ तो राजुला ने कहा कि ’मैं सुनपति शौका की लड़की राजुला हूं, अब बता जोगी, मेरा भाग क्या है’ तो जोगी ने प्यार से उसका हाथ अपने हाथ में लिया और कहा ’चेली तेरा भाग कैसा फूटा, तेरे भाग में तो रंगीली वैराट का मालूशाही था’। तो राजुला ने रोते हुये कहा कि ’हे जोगी, मेरे मां-बाप ने तो मुझे विक्खी पाल से ब्याह दिया, गोठ की बकरी की तरह हूण देश भेज दिया’। तो मालूशाही अपना जोगी वेश उतार कर कहता है कि ’ मैंने तेरे लिये ही जोगी वेश लिया है, मैं तुझे यहां से छुड़ा कर ले जाऊंगा’।
 
तब राजुला ने विक्खी पाल को बुलाया और कहा कि ये जोगी बड़ा काम का है और बहुत विद्यायें जानता है, यह हमारे काम आयेगा। तो विक्खीपाल मान जाता है, लेकिन जोगी के मुख पर राजा सा प्रताप देखकर उसे शक तो हो ही जाता है। उसने मालू को अपने महल में तो रख लिया, लेकिन उसकी टोह वह लेता रहा। राजुला मालु से छुप-छुप कर मिलती रही तो विक्खीपाल को पता चल गया कि यह तो वैराट का राजा मालूशाही है, तो उसने उसे मारने क षडयंत्र किया और खीर बनवाई, जिसमें उसने जहर डाल दिया और मालू को खाने पर आमंत्रित किया और उसे खीर खाने को कहा। खीर खाते ही मालू मर गया। उसकी यह हालत देखकर राजुला भी अचेत हो गई। उसी रात मालू की मां को सपना हुआ जिसमें मालू ने बताया कि मैं हूण देश में मर गया हूं। तो उसकी माता ने उसे लिवाने के लिये मालू के मामा मृत्यु सिंह (जो कि गढ़वाल की किसी गढ़ी के राजा थे) को सिदुवा-विदुवा रमौल और बाबा गोरखनाथ के साथ हून देश भेजा।
 
सिदुवा-विदुवा रमोल के साथ मालू के मामा मृत्यु सिंह हूण देश पहुंचे, बोक्साड़ी विद्या का प्रयोग कर उन्होंने मालू को जीवित कर दिया और मालू ने महल में जाकर राजुला को भी जगाया और फिर इसके सैनिको ने हूणियों को काट डाला और राजा विक्खी पाल भी मारा गया। तब मालू ने वैराट संदेशा भिजवाया कि नगर को सजाओ मैं राजुला को रानी बनाकर ला रहा हूं। मालूशाही बारात लेकर वैराट पहुंचा जहां पर उसने धूमधाम से शादी की। तब राजुला ने कहा कि ’मैंने पहले ही कहा था कि मैं नौरंगी राजुला हूं और जो दस रंग का होगा मैं उसी से शादी करुंगी। आज मालू तुमने मेरी लाज रखी, तुम मेरे जन्म-जन्म के साथी हो। अब दोनों साथ-साथ, खुशी-खुशी रहने लगे और प्रजा की सेवा करने लगे। यह कहानी भी उनके अजर-अमर प्रेम की दास्तान बन इतिहास में जड़ गई कि किस प्रकार एक राजा सामान्य सी शौके की कन्या के लिये राज-पाट छोड़्कर जोगी का भेष बनाकर वन-वन भटका।
 
यह कहानी शताब्दियों पुरानी है, पर पीड़ी दर पीड़ी यह कहानी आगे बड़ रही है, और सच ही कहा सच्चा प्यार कभी मरता नही है, हमेशा के लिए अमर हो जाता है।
By पं. भास्कर जोशी
« Last Edit: October 28, 2011, 02:42:36 PM by पं. भास्कर जोशी »
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Re: गेवाड़ घाटी की सुन्दरता
« Reply #4 on: October 28, 2011, 12:49:12 PM »
गेवाड़ घाटी

सुन्दर पहाड़ में बसा,
रामगंगा नदी के तीर,
मनोहर गेवाड़ घाटी,
प्राकृति की सुंदर तस्वीर,
**************
बसन्त ऋतु में छटा निराली,
घाटी में छाई हरियाली,
मन का सम्मोहन कर लेती,
कोयल के कुह-कुह अलबेली,
****************
नदी का धीमा माध्यम स्वर,
उस पर तट की घास सुनहरी,
आनंद विभोर मन हो जाता,
घाटी की देख शोभा न्यारी,
By पं. भास्कर जोशी in म्यर गेवाड़ घाटी के भलौं लागूं
« Last Edit: October 28, 2011, 02:33:13 PM by पं. भास्कर जोशी »
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Re: आ हा रे म्यर गेवाड़
« Reply #5 on: November 04, 2011, 11:12:19 AM »
कुमाऊँ की आलेखन परम्परा

कुमाऊँ का प्राचीन इतिहास अनेक कबीलों तथा विभिन्न संस्कृतियों को अपने आँचल में समेटे हुए है। कुमाऊँ में अल्पना तथा भिप्ति चित्रों का प्रत्यक्ष रुप व चलन चन्द शासन काल से होता है।
 
कुमाऊँ में चन्द वंश की स्थापना का सूत्रपात चम्पावत में सोमचन्द से आरम्भ होता है। सोमचन्द तथा उसके दश वंशजों का शासन... ९७५ ई. से ११७८ ई. तक माना जाता है। इस काल की सबसे उल्लेखनीय घटना इन्द्र चन्द का चीनी राजकन्या से विवाह होना है। इस विवाह के कारण स्थानीय जनता ने विद्रोह कर दिया और उसे तथा उसके शासन काल में बाहर से आये हुए ब्राह्मण, क्षत्रिय (राजपूत) लोगों को कुमाऊँ से बाहर भगा दिया। यह लोग २०० से २५० वर्ष तक कुमाऊँ में नहीं आ सके। परन्तु १३६५ ई. में उन्होंने पुन: काली कुमाऊँ में अपना राज्य स्थापित किया।
 
सबसे ध्यान देने वाली बात यह है कि यहाँ के प्रशासक अथवा शासक राजपूत वर्ग - महरा, फड़त्याल, जिन्ना, जलाल, मनराल, रोतौला, रजबार आदि में यह कला समृद्ध नहीं है और न उनके सांस्कृतिक जीवन का अटूट अंग। ऐपण व भिप्ति चित्रकला परम्परा कुमाऊँ में मात्र साह (साह) व ब्राह्मणों में ही अपने सम्पूर्ण विकसित स्वरुप तथा जीवन के समस्त सांस्कृतिक कार्यकलापों की गहराई की हद तक जुड़ी हुई है।
 
ब्राह्मणों में पंत व जोशी अपना मूल स्थान महाराष्ट्र व गुजरात मानते हैं। कहा जाता है कि सोम चन्द ८ वीं शताब्दी में गुजरात से ही आकर यहाँ बसा था। दूसरा मान्यता है कि सोम चन्द 'झूसी' इलाहाबाद का राजकुमार था और बैस राजवंश से सम्बन्धित था। तीसरी जनश्रुति कहती है कि सोम चन्द कन्नौज के शासक का भाई था, जो ज्योतिषियों की भविष्यवाणी के अन्तर्गत नये राज्य की कामना हेतु कुमाऊँ में आया था। उसका यहाँ आगमन उसकी बद्रीनाथ यात्रा के निमित्त हुआ था। तत्कालीन शासक ब्रह्मदेव ने अपनी कन्या का विवाह इससे किया और दहेज में चम्पावत के सुई क्षेत्र, दुर्ग तथा तराई की कुछ भूमि भी इसे प्रदान की। इस कथन का साक्ष्य कुमाऊँ क्षेत्र में घसने वाले 'साह' लोगों की इस मान्यता से होता है कि साह अपना पूर्व स्थान 'झूसी' इलाहाबाद को मानते हैं और आज भी साह लोग विशेष रुप से बढ़े-बूढ़े जब कभी प्रयाग व कुम्भ स्नान के लिए जाते हैं, तब झूसी में ही रहना सार्थक समझते हैं। दूसरी बात यह है कि कुमैया साह अपना पूर्ववर्ती स्थान चम्पावत को मानते हैं। इन सब बातों से यही विश्वास होता है कि 'साह' लोग चन्दों के साथ ही बाहर से आये।
 
ऐपणों व भिप्ति चित्रों, जिनको 'लिख थाप' या थापा कहते हैं, में अनेक प्रकार के प्रतीक व लाक्षणिक अन्तर दृष्टिगोचर होते हैं। साहों व ब्राह्मणों के ऐपणों में सबसे बड़ा अन्तर यह है कि ब्राह्मणों में चावल की पिष्ठि निर्मित घोल द्वारा धरातलीय अल्पना अनेक आलेखन प्रतीकों, कलात्मक डिजाइनों, बेलबूटों में प्रकट होती है। साहों में धरातलीय आलेखन ब्राह्मणों के समान ही होते हैं परन्तु इनमें भिप्ति चित्रों की रचना की ठोस परम्परा है। थापा श्रेणी में चित्रांकन दीवलों या कागज में होता है। यह शैली ब्राह्मणों में नहीं के बराबर है। जिन आलेखनों या चित्रों की रचना कागज में की जाती है। उन्हें प कहते हैं। इसी प्रकार नवरात्रि पूजन के दिनों में दशहरे का पट्टा केवल साह लोग बनाते हैं। विवाहोत्सव में विवाहित स्रियों के लिए विशेष प्रकार का कुसुमी पिछौड़ा (विशेष ओढ़नी) सारे कुमाऊँ में प्रचलित है परन्तु इनके निर्माण व रंगों की आभी साह व ब्राह्मणों में विशेष है। साहों के कुसुमी पिछौड़े विशिष्ट रंगों व प्रकाश के कारण तथा केन्देर स्थल के निर्माण के कारण सर्वश्रेष्ठ समझे जाते हैं और यही ब्राह्मणों के कुसुमी पिछौड़े के आलेखन व रंग आभा तथा साहों के कुसुमी पिछौड़े के रंगों के प्रयोग तथा केन्द्र के आलेखन का प्रबल लाक्षणिक अन्तर स्पष्ट करते हैं। ऐपणों में एक स्पष्ट अन्तर यह है कि ब्राह्मण गेरु मिट्टी से धरातल का आलेपन कर चावल के आटे के घोल से सीधे ऐपणों का आलेखन करते हैं परन्तु साहों के यहाँ चावल की पिष्टि के घोल में हल्दी डालकर उसे हल्का पीला अवश्य किया जाता हैं तभी ऐपणों का आलेखन होता है। ज्ञात हुआ कि उच्चकुलीन ब्राह्मणों में जो दीवानों की कोटि में आते हैं, वे भी 'बिस्वार' (चावल की पिष्ठि का घोल) में कच्ची अथवा सूखी हल्दी पीस कर डाल दी जाती है और पीली आभा युक्त ऐपण दिये जाते हैं।
 
साहों के यहाँ ऐपणों के अन्तर्गत एक और विशेष शैली है, जिसे 'वर' कहा जाता है। क्योंकि इसमें बूँदों तथा उनकी सँख्या द्वारा समान रुप से वरों व डिज़ाईनों का निर्माण किया जाता है। हर डिजाइन व अभिप्राय के लिए बूंदों की अलग-अलग संख्या निर्धारित है। प्रत्येक आलेखन विशेष ज्योमितीय अलंकरण, बूंदों की संख्या, विशेष रंग द्वारी निर्धारित व नामांकित है। पट्टे पर वर बूंद मुख्यत: उपासना या पारिवारिक पूजा गृह में ही सुशोभित रहते हैं। पर बूंदों का चित्रांकन पूजा गृह के अतिरिक्त भी दृष्टिगोचर होता है। यदि उनके निर्माण का कारण जाना जाय तो शत प्रतिशत यह तथ्य उजागर होता है कि अमुक समय में विवाह या यज्ञोपवीत संस्कार उस स्थान पर हुआ था, इसलिए वहाँ वरों का निर्माण हुआ था। थापा पट्टा शैली, ज्यूति मातृका इत्यादि शैलियाँ चम्पावत या संलग्न क्षेत्र में मात्र कुछ ब्राह्मण अथवा साह परिवारों के अतिरिक्त कहीं भी दृष्टिगोचर नहीं होतीं। अन्य इनका ज्ञान नहीं रखते। इन शैलियों की विगत १०० वर्षों से सुरक्षित अनेक रचनाएँ आज भी अल्मोड़ा, रानीखेत में हैं। इनका आलेखन आज भी उसी उत्साह व मान्यताओं के आधार पर होता है जो विगत शताब्दियों से था। प्रयुक्त संकेतों, कोणों, बिन्दुओं, चित्रकृतियों व विभिन्न अनुष्ठानों के लिए विभिन्न संख्या को बिन्दुओं द्वारा निर्मित यंत्र चौकियों के देखने से स्पष्ट होता है कि कुमाऊँ की इस कला में वज्र यानी, शैव व शाक्त तांत्रिक अवुष्ठानों व मान्यताओं का प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ा है।
 
रेखाचित्रों वाले पट्टों व ज्यूतियों में 'जैनशैली' जो अपनी प्रारम्भिक अवस्था में गुजरात में 'अपभ्रंश' शैली के रुप में विकसित व प्रतिष्ठित हुई थी, स्पष्ट रुप से दिखाई देती है। इसके अतिरिक्त राजस्थानी शैली, जो कि अपभ्रंश शैली का ही विकसित रुप थी व विशेष रुप से 'मालवा शैली', जो राजस्थानी शैली की ही एक धारा है, से भी विकसित होकर उभरी। इसका उदाहरण ज्यूति मात्रिका पट्टा, शेष शय्या (शेषनाग की शय्या पर विराजमान विष्णु व लक्ष्मी), महालक्ष्मी पट्टा, डोर दुबज्योड़ पट्टा, कृष्ण जन्माष्टमी पट्टा व नवदुर्गा पट्टा (नवरात्रि पूजन के समय) में दृष्टिगोचर होता है।
 
कुमाऊँ की ज्यूति मातृका पट्टों, थापों तथा वर बूदों में श्वेताम्बर जैन अपभ्रंश शैली का भी स्पष्ट प्रभाव दिखाई देता है। श्वेताम्बर जैन पोथियों की श्रृंखला में बड़ौदा के निकट एक जैन पुस्तकागार में ११६१ ई. की एक ही पुस्तक में औधनियुक्ति आदि सात ग्रंथ मिले, जिनमें १६ विद्या देवियों, सरस्वती, लक्ष्मी, अम्बिका, चक्र देवी तथआ यक्षों के २१ चित्र बने हैं। इन ग्रंथ चित्रों में चौकोर स्थान बनाकर एक चौखट सी बनाई गई हैं और इनके मध्य में आकृतियाँ बिठाई गई हैं। ठीक इसी प्रकार का चित्र नियोजन कुमाऊँ के समस्त ज्यूति पट्टो, थापों व बखूदों में किया जाता है। कुमाऊँ में ज्यूति पट्टों में महालक्ष्मी, महासरस्वती व महाकाली ३ देवियाँ बनाई जाती है साथ में १६ षोडश मातृकाएं तथा गणेश, चन्द्र व सूर्य निर्मित किये जाते हैं। अपभ्रंश शैली में रंग व उनकी संख्या भी निश्चित है। जैसे लाल, हरा, पीला, काला, बैगनी, नीला व सफेद। इन्हीं सात रंगों का प्रयोग कुमाऊँ की भिप्ति चित्राकृतियों अथवा थापों व पट्टों में किया जाता है।
 
कुमाऊँ में प्रचलित मुख्य ऐपणों व चौकियों की सविस्तार चर्चा इस प्रकार की जा सकती है -
सरस्वती पीठ -
तीन प्रकार से बनाई जाती है। धरातल को पहले गेरु मिट्टी के घोल से लीप लेते हैं। फिर चावल पिष्ठिका (विस्तार) से रेखांकन किया जाता है। साह इसमें पीली आभा लाते हैं व ब्राह्मण विस्तार का रंग सफेद ही रहने देते हैं।
(अ) ९ (नौ) बिन्दुओं द्वारा इसका निर्माण होता है। इन बिन्दुओं को रेखा द्वारा इस प्रकार जोड़ा जाता है कि आठ (८) भद्र स्वरुप निकल आते हैं। यह कृति सरस्वती चौकी या अष्टदल कंवल कहलाती है। इसको बनाने के बाद ही इस पर देव प्रतिमाएँ स्थापित की जाती है।
 
(ब) सरस्वती पीठ में ९ (नौ) बिन्दु बनाये जाते हैं और इन्हें रेखा द्वारा इस प्रकार एक दुसरे से मिलाया जाता है कि ९ (नै) षोडश या स्वस्तिक बन जाते हैं। इस पीठ का निर्माण नवरात्रियों में देव स्थापना व पूजन हेतु किया जाता है।
 
(स) एक तारा का निर्माण किया जाता है। इसके ५ (पांच) कोण होते हैं। इसे स्वस्तिक यंत्र, पंच शिखा या पंचानन भी कहा जाता है। यह चिन्ह सृष्टि की रचना का सूचक है। इसके ५ कोण पांच तत्वों - पृथ्वी, जल, आकाश, वायु, अग्नि - के द्योतक हैं। महा उग्र तारा यंत्र भी ५ कोणीय या शिखा वाला होता है। इस यंत्र को जटा शंकरी भी कहा जाता है। मुख्यत: इसका प्रयोग अध्र्य स्थापना व देव स्थल के मुख्य दीया जलाने के समय किया जाता है। इसे निर्मित कर इसके ऊपर मुख्य दिये को रख दिया जाता है।
 
(द) सरस्वती या श्री यंत्र देवी चौकी २ (दो) समत्रिबाहु त्रिभुजों को एक दूसरे के विपरीत तथा ऊपर बैठाकर किया जाता है। इसमें ६ भुजाऐं तथा ६ कोण होते हैं। यह काली या नवदुर्गा पूजन के कार्य में निर्मित होती है।
 
महालक्ष्मी पूजन हेतु चौकी का निर्माण - इस चौकी का निर्माण ९ (नौ) बिन्दुओं द्वारा किया जाता है। सरस्वती चौकी अथवा अष्टदल कंवल की ही भांति होती है। अन्तर मात्र यह होता है कि चौकी के चारों ओर दो पाँवों की छाप बनाई जाती है। इसका आयोजन इस प्रकार होता है कि पाँवों की छाप एक अलंकृत बेल की तरह दृष्टिगोचर होती है। कहीं-कहीं कोई परिवार ८ (अष्ट) कोणीय कमल का निर्माण करते हैं।
जनेऊ पीठ - जनेऊ पीठ या यंत्र का निर्माण षट्कोण के अन्दर प्रत्येक भुजा पर आठ (८) बिन्दुओं का अंकन किया जाता है। इसी प्रकार मध्य भाग में बराबर दूरी में तथा समानान्तर ८ बिन्दुओं का अंकन किया जाता है। मध्य भागीय बिन्दुओं को रेखा द्वारा इस प्रकार जोड़कर व्यवस्थित किया जाता है कि रचना ७ श्री यंत्रों की छटा लिए हुए प्रकट होती है। इन्हें सप्तॠषि मण्डल कहा जाता है। यह हैं कश्यप, अत्रि, भारद्वाज, जमदग्नि, गौतम, विश्वामित्र तथा वशिष्ठ। इस सम्पूर्ण यंत्र के शीष में मुकुट तथा दाईं व बाईं तरफ २-२ हाथ अथवा कांगें तथा चरण पीठ बनाई जाती है। इस यंत्र को मां गायत्री देवी के रुप में चतुर्भुजी माना जाता है। इस यंत्र का निर्माण जनेऊ या उपनयन संस्कार के समय अत्यावश्यक होता है।
 
शिव पीठ यंत्र - इस यंत्र स्वरुप अल्पना का आलेखन १२न्१२ बिन्दुओं द्वारा, दूसरे प्रकार में १६न्१६ बिन्दुओं द्वारा किया जाता है। बाह्य धरातल को कुण्डी (ताम्र पात्र) के स्वरुप में अंकित किया जाता है। ईषाण व ऊषाण का अंकन होता है। यह श्रावण मास में शिव पूजन हेतु बनाई जाती है।
 
सूर्य चौकी - इसका निर्माण नामकरण संस्कार के बाद नव शिशु को बाहर प्रकाश में लाये जाने पर किया जाता है। इसके अतिरिक्त इसका निर्माण सूर्य व्रत के उपलक्ष्य में रविवार को पौष माह में भी किया जाता है। इसमें चन्द्र, सूर्य, शुक्र (विष्णु-लक्ष्मी), अठ जल (अष्ट कोणीय यंत्र), शंख, घंटा, कुण्डी या चक्र आसन, आरती, गड़ु़वा, धूपदान पुन: आसन निर्मित किया जाता है।
 
स्यो - नामकरण संस्कार के बाद छटी का चाक विसर्जन करने नौला जाते हैं। तब आंगन में स्यो का चित्रांकन अल्पना द्वारा होता है। ब्राह्मणों तथा साहों में अलग-अलग प्रकार का स्यो बनता है। ब्राह्मणों में कमल दलो का सिंहासन सदृश स्यो निर्मित होता है। सबसे नीचे ५ कमल पंखुड़ियाँ निर्मित की जाती है, उनके स्वर ४,३,२,१ के हिसाब से निर्माण होता है। ऊपर शीर्षमुकुट नीचे पद वेदी बनती है। साहों में स्यो कलश या गडुवे के रुप में बनता है।
 
नाता - साहों में नातों का निर्माण व मान्यता विशिष्ट है। नाते दो समय अथवा कालों में बनाये जाते हैं। इनका अलंकरण व रेखांकन केवल चूल्हे या भोजन कक्ष में होताहै। जो नाते चैत्र मास में बनाये जाते हैं उन्हें चैतु नाता कहते हैं। इसके बाद दीपावली में नातों को बनाया जाता है। यह भी ऐपण का प्रकार है जो केवल पीली मिट्टी के धरातल पर बिस्वार से अंकित किया जाता है। बाईं और विशिष्ट शैली में अंगुलियों की पोरों से ३ मानवीय आकृतियां बनाई जाती हैं जिनके हाथ एक दूसरे के हाथों को पकड़े हुए बनाये जाते हैं। यह सामंती युगीन मान्यता की अभिव्यक्ति है कि अमुक परिवार में भोजन कक्ष में ब्राह्मण, क्षत्रिय व वैश्य ३ सवर्ण जातियों के लोग ही भोजन खाने के अधिकारी हैं। दाईं ओर लक्ष्मी व नारायण का नाता रेखांकित किया जाता है जो पवित्रता व धन धान्य दाता व पालककर्त्ता समझे जाते हैं। मध्य में धान की बालियों के प्रतीक चिन्हों के अंकन द्वारा परिवार के सदस्यों तथा निकट सम्बन्धियों की संख्या दर्शाई जाती है। यह एक प्रकार से सम्मिलित परिवार की सदस्य संख्या का लेखा जोखा अंकित करता है। यह दो प्रकार से बनाये जाते हैं (अ) अल्मोड़ा शैली (ब) बागेश्वर शैली।
 
धुँया - इसका आलेखन दीपावली के दिन अमावस्या के बाद बड़ी एकादशी (१२ दिन के बाद) को किया जाता है। इसे बूढ़ी दीपावली कहते हैं। इसका आलेखन सूप में किया जाता है। इसकी कल्पना सूप से समान पंख युक्त पक्षी की होती है। कुछ लोग गरुढ़ आरुढ़ नारायण की बात इसके लिए कहते हैं। मान्यता है कि पारिवारिक क्लेश, दरिद्रता को दूर करने की कल्पना से इनका निर्माण होता है।
 
धूलि अध्र्य की चौकी - यह कमल के आकार की अल्पना है। इसका कलेवर गड़ु़वा (टोंटीदार कलश) की तरह अंकित किया जाता है। केन्द्र स्थल यज्ञ वेदी के समतुल्य अंकित किया जाता है। आड़ी तिरछी चार रेखाऐं बनाई जाती हैं, जो अरणी-भरणी यज्ञ काष्ठ की द्योतक होती है। इसका फैलाव केन्द्र स्थल से बाहर की ओर बढ़ता जाता है। अंकन के लिए कमल दल के प्रधानता दी जाती है। इसका स्वरुप गोलाई लिये हुए कलश की तरह बनाया जाता है। दोनों ओर २-२ हाथ की तरह फांगे अलंकृत हाथी की सूँड की तरह बनाये जाते हैं। इनके अन्तिम सिरे पर गगरी बनाई जाती है। यह विष्णु स्वरुप पवित्र समझा जाता है। शीर्ष के मुकुट व नीचे पाँवों की ओर पाठ निर्मित की जाती है। इसमें विष्णु प्रतीक शंख, चक्र, गदा, पद्म अंकित किये जाते हैं। विवाह की र सर्वप्रथम इसी से प्रारम्भ होती है। कन्या का पिता वर का स्वागत, चरण प्रक्षालन व अध्र्य दान संकल्प सहित, वर को इसी चौकी पर खड़ा करके कन्या का दान करता है तथा भेंट देता है।
अब उन चित्रांकनों का विवरण दिया जा रहा है जिनमें चावल पिष्ठिका घोल व गेरु का प्रयोग नहीं किया जाता वरन् विभिन्न रंगों - लाल, चटख लाल, हरा, पीला, नीला, बौजनी, काला व सफेद - को प्रयोग में लाया जाता है।
 
मुहाली, द्वार मातृ, माई तथा विजन - इनका निर्माण विवाहोत्सव में मुख्य द्वार के सौन्दर्यीकरण के लिये किया जाता है। माई, विजन व द्वार मातृ बुरी दृष्टि व अशुभ को दूर करने की कामना से चित्रित किये जाते हैं।
 
विवाह का ज्यूति पट्टा - इसमें महाकाली, महालक्ष्मी व महासरस्वती केन्द्र में बनाई जाती है। इनके साथ गणेश, सूर्य, चन्द्र व १६ मातृकाएं अंकित की जाती है। इन्हें चौकोर रेखिकीय चौखट में अंकित कर बाहर की ओर मछिया सिंगालिया अथवा खोडस वरों से अलंकृत किया जाता है। शीर्ष पर बड़े हिमालय व छोटे हिमालय का अंकन किया जाता है। इन सबके शीर्ष पर 'हलयाली बोट' - हरा पेड़ जो कल्पतरु माना जाता है, कमल (८ पंखुडियों वाला), शुक - सारिका (लक्ष्मी-नारायण) व दो हरे तोतों का निर्माण किया जाता है। राधा कृष्ण का चित्रांकन मनुष्याकृति में किया जाता है। शुकसारिका, शेष नाग की शय्या में लेटे हुए विष्णु व चरणों के पास लक्ष्मी तथा नाभि से उत्पन्न कमल पर ब्रह्मा की कल्पना को विशिष्ट रेखाओं द्वारा निर्मित किया जाता है।
 
यज्ञोपवीत का ज्यूति पट्टा - इसका निर्माण विवाह ज्यूति की ही तरह होता है। मुख्य अन्तर यह है कि शीर्ष पर विष्णु-लक्ष्मी या कृष्ण-राधा की मानवीय प्रतिमा का रेखांकन नहीं होता। दूसरा अन्तर है शीर्ष पर बाईं ओर सप्त ॠषि मण्डल का जनेऊ पीरु की तरह बनाया जाता है तथा दाहिनी ओर छापरी (भिक्षा पक्ष का निर्माण) किया जाता है। मान्यता है कि 'गिरह जाग' पर बालक चुन्डित मुन्डित हो एक कौपीन मात्र पहनकर ब्रह्मचर्याश्रम में प्रविष्ट करता है तथा विद्या अध्ययन के लिए काशी में अपने गुरु के पास जाता है। ब्रह्मचर्याश्रम में भिक्षा द्वारा ही अपना व गुरु पोषण का दायित्व वहन करता है। अध्ययन के उपरान्त उसका उपनयन व यज्ञोपवीत संस्कार किया जाता है। अत: इस अवसर पर ज्यूति पट्टे की पूजा अर्चना की जाती है।
 
छट्टी की ज्यूति व सामान्य ज्यूति - यह ज्यूति पट्टा भी विवाह ज्यूति पट्टे की तरह ही होता है। परन्तु इसमें शीर्ष पर लक्ष्मी नारायण या राधकृष्ण की मानवीय अवयवों से युक्त प्रतिमा का आलेखन नहीं किया जाता है। बाकी अलंकरण व स्वरुप का विन्यास अन्य ज्यूतियों की तरह ही किया जाता है।
 
ज्यूति मातृका चौकी - इसका निर्माण काष्ठ चौकी को हल्दी से रंग दिया जाता है। इसमें समस्त अलंकरण लाल रंग की रेखाओं द्वारा निर्मित किये जाते हैं। इसमें न तो किसी प्रकार के 'वर' बनाये जाते हैं और न 'छज्जा' बेल को बनाया जाता है। अन्य सभी प्रतीक व अलंकरण विवाह ज्यूति की तरह ही होते हैं। इसमें भी लक्ष्मी नारायण या राधा कृष्ण की युगल मानवीय आकृति नहीं बनाई जाती।
 
जन्माष्टमी का पट्टा या थापा - सर्वप्रथम शिव पार्वती बनाये जाते हैं। उसके उपरान्त दशावतार निर्मित किये जाते है। शिव की जटाओं से गंगा व यमुना का उद्गम निर्मित किया जाता है। इसके उपरान्त कृष्ण की विस्तृत लीलाएं दर्शायी जाती हैं। इनकी अभिव्यक्ति पूर्णत: सुखसागर, भागवत के अतिरिक्त ब्रह्मपुराण व विष्णुपुराण के अनुसार होती है। इसमें गोवर्धन धारण इत्यादि को अंकित किया जाता है। चारों ओर सुन्दर गौ पुच्छ लता निर्मित की जाती है।
 
हरशयनी पट्टा - इस थापे में विष्णु को शेषनाग की शैय्या पर लेटा हुआ तथा चरणों को दबाते हुए लक्ष्मी दर्शाई जाती है। क्षीरसागर का निर्माण किया जाता है। प्रतीक रुप से नीले गहन जल में मछली तथा कछुवा और नाभि से उत्पन्न कमल व उस पर चार मुख वाले ब्रह्म रेखांकित किये जाते है। चारों ओर घंटी या लगुली बेल बनाई जाती है।
 
हर बोधिनी पट्टा - इसे तुलसी विवाह के अवसर पर मात्र लाल रंग से निर्मित किया जाता है। यह एक प्रकार की चौकी होती है। इसे १२ (बारह) बिन्दुओं से निर्मित किया जाता है। उसमें ४ भद व एक कँवल बनता है। इसे भी चारों ओर से सुन्दर लता व पुष्पों के निर्माण से भव्य रुप दिया जाता है। इसे 'बाल भद्र' के नाम से जाना जाता है।
 
दूर्वाष्टमी और डोर दुवज्योड़ा पट्टा - इसमें सात रानिया, एक नौला (जल भरने का कूप), नौले में बच्चा बनाया जाता है। बच्चे के एक हाथ में माँ के गले में पड़े तागे को पकड़ रखा है। यह तागा डोर कहलाता है तथा हाथ में भुज दण्ड की तरह ३ पल्ले का धागा औरतें धारण करती हैं। इन्हें दुबज्योड़ा कहते हैं। यह एक प्रकार से स्रियों द्वारा जनेऊ की तरह पवित्र समझकर धारण किया जाता है। इन पर २-२ चिड़ियाँ बैठाई जाती है। इसका निर्माण लोक कथा पर आधारित है।
 
ॠषिपंचमी व नागपंचमी पट्टा - इसमें वामनावतार (विष्णु) तथआ सप्त ॠषि बनाये जाते हैं। विशेष आकृति युक्त नाग जोड़े में होते हैं।
 
महालक्ष्मी का पट्टा - इसमें ३ छत्र बनाये जाते हैं। ८ पंखुड़ियों वाले कमल में चार भुजाओं वाली महालक्ष्मी को बनाया जाता है। बाईं तरफ के हाथों में चक्र व पद्म बनाया जाता है तथा दाईं तरफ के हाथों में त्रिशूल। नीचे ९ बिन्दु वाली सरस्वती चौकी या 'घृत कंवल' बनाया जाता है। लक्ष्मी के दोनों ओर दो-दो हाथी सूंड उठाकर जल कलश से लक्ष्मी का प्रक्षालन करते हैं। उसके नीचे दोनों ओर अठजल (जल कुण्ड आठ भुजाओं वाले) बनाये जाते हैं।
 
नवदुर्गा पट्टा - यह पट्टा साह वंश में ही प्रचलित है और कुमाऊँ की मान्यताओं, धार्मिक विश्वासों व अंकन शैली का प्रतीक है। इसमें मुख्यत: पीला, लाल, नीला, काला तथा हरा रंग प्रयोग में लाया जाता है। इसका धरातल पीला बनाया जाता है। उसके उपरान्त ही अन्य प्रतीक, आकृतियाँ तथा मंत्रों का आलेखन होता है। चौकोर या आयताकार पट्टे के चारों ओर सुन्दर किनारे का निर्माण किया जाता है। उसके उपरान्त ही मुख्य पट्टे का आलेखन प्रारम्भ होता है। इसका प्रयोग विशेषरुप से आश्विन मास की नवरात्रियों में भगवती पूजन व व्रत के लिए होता है।
 
कुमाऊँ में भिप्ति - चित्रण व अलंकरण की कोटि के अन्तर्गत वर-बूंद आते हैं, जो निम्न प्रकार के हैं - सूरजी वर, गुलाब चमेली वर, मुष्टि वर, अलमोड़िया खोडस, गलीची वर, विशिष्ट गलीचीवर, कटारी वर, २० बिन्दु का संगलिया वर, २२ बिन्दु का संगलिया वर, १६ बिन्दु का भद्र वर, १९ बिन्दु का भद्र, स्वास्तिक फूल या ६ फूल वर, २४ बिन्दु का, ६ फूल वर, २२ बिन्दु का, घौर तिलक ३७ बिन्दु का वर, हर हर मण्डल वर, ३७ बिन्दु का नींबू वर, ९ (नौ) बिन्दु का मछिया वर, खोड्स वर या खोड्स वर, २२ बिन्दु का, खोड्स वर २४ बिन्दु का, खोड्स वर ६ बिन्दु का, खोड्स वर १२ बिन्दु का।
 
कुमाऊँनी ऐपणों को अगर सूक्ष्मता से देखा जाए तो बोध होता है कि इन पर बंगाल का स्पष्ट प्रभाव है। भले ही कुछ प्रतीक व नाम शुद्ध कुमाऊँनी भाषा व क्षेत्र के ही हैं परन्तु पूर गठन बंगाल की अल्पना के प्रभाव से पूर्ण दिखाई देता है। १६वीं सदी के तारानाथ, जो तिब्बती इतिहासकार थे, द्वारा लिखित इतिहासकार से ज्ञात होता है कि ७वीं सदी में पश्चिमी भारत में 'भाखड़' से एक चित्र शैली प्रचलित हुई और ९वीं सदी से पूर्वी भारत में भी एक शैली का प्रचलन हो चला था। पहले नेपाल के चित्रकार पश्चिम भारतीय शैली में काम करते थे परन्तु बाद को उन्होंने पूर्वी शैली को अपना लिया। यह पूर्वी शैली ही आगे चलकर 'सेन' और 'पाल' शैली कहलाई। इस शैली में जहाँ चित्रों का निर्माण मात्र लाल, पीला, नीला, काला, सफेज, बैगनी रंगो में होता था, वहीं चित्रांकन उसी प्रकार होता था जिस प्रकार कुमाऊँ में लिख थापों व वर बूंदों में। बंगाल में सेन व पाल शासन में अनेक वज्रयानी (तांत्रिक) स्थविर प्रगट हुए तथा उस समय तांत्रिक बैद्ध (वज्रयानी) केवल नेपाल, बिहार तथा बंगाल में ही शेष रह गए थे और तिब्बत बज्रयानी लामावाद का दुर्ग बन चुका था। इसलिए कुमाऊँ के वर बूंद, जो १२ या १३ प्रकार के हैं, के विषय में कुमाऊँ की वयोवृद्ध जानकारों का कहना है कि यह कला भोट देश अर्थात् तिब्बत से आयी है। मान्यतानुसार शिव का स्थान कैलाश पर्वत तथा विष्णु का मानसरोवर दोनों भोट प्रदेश (तिब्बत) में हैं। इसी प्रकार शिव-पार्वती व विष्णु की पूजा अर्चना के लिए हर हर मण्डल व गौर तिलक का निर्माण किया जाता है।
 
कुमाऊँनी ऐपणों में चावल पिष्टि के घोल का प्रयोग करते हैं, उसी प्रकार बंगाल के ऐपणों का निर्माण व आलेखन होता है। बंगाल में कृषि विषयक लौकिक आचार तथा अनुष्ठान की अल्पना है। कुमाऊँ में भी इसी प्रयोजन के लिए लोक संस्कृति में हरेला, डिकरा, बिरुड़िया व डोर दुबज्योड़ पूजा का विधान व थापे तथा ऐपण हैं।
 
कुमाऊँ में लक्ष्मी व्रत व पूजा के लिए अल्पना द्वारा षट् कोणीय श्रीयंत्र का मध्य में निर्माण कर अथवा सरस्वती पीठ का निर्माण कर अष्ट दल कमल से घेर दिया जाता है। तत्पश्चात चारों सम्पूर्ण क्षेत्र को विभिन्न पुष्पों व लताओं के प्रतीकों से भर दिया जाता है।
 
कुमाऊँ में विवाहोत्सव अवसर पर रंगों द्वारा भी चित्रों का निर्माण किया जाता है जैसे - ज्यूति पट्टा (विवाह का), वर बूंद, मातृका चौकी (काष्ठ पर), पंच पात्रों (पांच प्रकार के बर्तन) व जाल के साथ भेंट की जाने वाली विवाह चौकी। यह वर व कन्या पक्ष दोनों बनाते है।
by पं. भास्कर जोशी
« Last Edit: November 04, 2011, 11:16:11 AM by पं. भास्कर जोशी »
पं. भास्कर जोशी

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« Reply #6 on: November 04, 2011, 11:14:04 AM »
श्री नैथना देवी मंदिर
             1. गोरखों की गढ़ी (किला)

मंदिर के पास ही गोरखों की गढ़ी है जो अब खंडहर के रुंप में है। कहा जाता है कि यहां से दूरबीन से दिल्ली देखा जा सकता था। सन् 1815 में गोरखों ने अंग्रेजों के साथ समझौता करके कुमाऊंं व गढ़वाल के जो क्षेत्र उनको दिए थे उनमें से यह गढ़ी भी एक थी। इस गढ़ी का जीर्णोद्धार कर इसको पर्यटन स्थल के रुंप में विकसित करना वर्तमान संस्था का मुख्य उद्देश्य है। संस्था ने इस मामले को सर्वोच्च स्तर पर उठाया है।

2. उत्तमसांणी

नैथना मंदिर से लगभग 2 किलोमीटर पूर्व की तरफ सुरम्य उत्तमसांणी पर्वत है जो चीड़, बांज व काफल के पेड़ों से घिरा हुआ है। यहां पर राजकीय इंटर कालेज है। ट्रैकिंग के लिए यह उत्तम स्थान है।

3. महादेव मंदिर

नैथना देवी मंदिर के पूर्व की ओर 3 किलोमीटर की गहराई में पाण्डव कालीन प्रसिद्ध बागनाथ (महादेव) का मंदिर है। यह स्थान बागेश्वर के नाम से प्रसिद्ध है। महाशिव रात्रि पर्व पर यहां मेला लगता है।

4. पाली

मंदिर के दक्षिण-पश्चिम में पाली नामक स्थान है। यह स्थान किसी समय इस क्षेत्र की शिक्षा का प्रमुख केन्द्र था। यहां किसी समय में तहसील भी रही है और सरकारी पाली के नाम से भी प्रसिद्ध है। यहां पर सन् 1900 में सबसे पहले अंग्रेजों ने मिडिल स्कूल की स्थापना की थी, अब यहां पर इंटर कालेज है। यहां से नैथना पर्वत का नयनाभिराम दृश्य दिखाई देता है।

5. मासी

नैथना पर्वत के मूल में रामगंगा का तट पर " मासी " बसा हुआ है। यह मोटर मार्ग द्वारा सभी स्थानों से जुड़ा हुआ है। रामगंगा के तट पर ही बसी हुई सुरम्य उर्वरा गेवाड़ घाटी है जो कभी महाभारत कालीन विराट राजा के अधीन थी। मंदिर से देखने पर यहां का दृश्य मनोहारी लगता है। लोक प्रसिद्ध भूमिया मंदिर भी यही स्थित है।

6. द्वाराहाट - दूनागिरी

नैथना मंदिर से 20 किलोमीटर की दूरी पर द्वाराहाट और दूनागिरी नामक स्थान है जो मोटर मार्ग से नौबाड़ा से जुड़े हुये हैं। द्वाराहाट में 12वीं व 13वीं शताब्दी के 365 मंदिर व नौले हैं। प्रसिद्ध विद्वान पंडित राहुल सांकृत्यायन इन मंदिरों का निरीक्षण करने के लिए 1953 में यहां आये थे। जब उनका ध्यान नैथना पर्वत पर स्थित गोरखों के एकमात्र स्मारक " गढ़ी " की ओर गया तो वे इसको देखने के लिए बड़े उत्सुक हुए थे, लेकिन किन्हीं कारणों से वे वहां नहीं जा सके। इसी स्थान पर नैथना देवी मंदिर के वर्तमान स्वरुंप के निर्माता संत-शिरोमणि स्वामी हरनारायण जी की समाधि भी है।
7. सूर्योदय व सूर्यास्त का अद्भुत दृश्य

यहां प्रात:कालीन उगते सूर्य की स्वर्णिम किरणें माँ के चरणों में प्रणाम करती हैं तथा एक मनोहारी दृश्य उपस्थित करती हैं और सूर्यास्त के समय भी ऐसा लगता है मानो सूर्य माँ से दूसरे दिन जल्दी आने का वादा करके जा रहे हों। प्रकृति के इस अनुपम दृश्य को देखना जीवन की एक बड़ी उपलब्धि एवं शुभ माना जाता है।

या देवी सर्वभूतेषु श्रद्धा रुंपेण संस्थिता, नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
(जो माँ भगवती समस्त प्राणियों में श्रद्धा रुंप से स्थित है उनको बारम्बार नमस्कार है)

सर्व रुंप में व्याप्त माँ का यह स्थान कब से आलोकित था यह तो शायद ही कोई बता पाये लेकिन स्थानीय लोगों पर अपनी कृपा प्रदान करने हेतु माँ किसी निमित्त से विग्रह के रुंप में प्रकट होती है। लोक कथा है कि जहां माँ का यह विग्रह स्थापित है वहां पर झाड़ियां थीं। अल्मोड़ा जिले में सोमेश्वर के पास चौड़ा नामक गांव का एक परिवार पलायन कर ग्राम गोहाड़ के पास बस गया। इन लोगों के एक भाई मुनि हो जाने के कारण इस गांव का नाम मुनियाचौरा पड़ा जो आज तक प्रचलित है। छोटा भाई खेतीबाड़ी का काम करता था और गाय-भैंस पालता था। इस परिवार की एक गाय प्रतिदिन रात को नैथना देवी के इस विग्रह पर आकर खड़ी हो जाती थी और अपने समस्त दूध को माँ के विग्रह पर चढ़ा देती थी तदुपरांत घर लौट आती थी। गाय के मालिक को लगा कि शायद रात में कोई व्यिक्त दूध को दुह लेता है। इस रहस्य को जानने के लिए एक दिन वह छिपकर गौशाला में गाय पर नजर रखने लगा। उसने देखा कि अचानक आधी रात को गाय अपने आप खूंटे से खुलकर बाहर निकली और उत्तर दिशा की ओर पहाड़ी पर चली गई तथा प्रात:काल से पहले वापस आकर अपने खूंटे से बंध गई। इस घटना से वह व्यिक्त विचलित हो गया।

तदुपरांत उस व्यिक्त ने एक दिन हाथ में कुल्हाड़ी लेकर गाय का पीछा किया। उसने देखा कि गाय झाड़ियों में जाकर अपना दूध निखार रही थी। वह इस बात से अनभिज्ञ था कि गाय अपना दूध देवी की मूर्ति पर निखार रही है। क्रोधित होकर उस व्यिक्त ने माँ के विग्रह पर कुल्हाड़ी से वार कर दिया। जिसका निशान आज भी स्पष्ट रुंप से देखा जा सकता है। वह इतना भी विवेक नहीं कर पाया कि यह किसकी माया है? उसे तो साक्षात दर्शन मिल चुके थे। शायद प्रारब्ध ही ऐसा रहा होगा। उसी समय आकाशवाणी हुई कि तुमने यह ठीक नहीं किया इसका फल तुम्हें भोगना पड़ेगा। कहा भी गया है कि:-
"अवश्यमेव भोक्तव्यम् कृतम् कर्म शुभाशुभम्"
(किये गये शुभ और अशुभ कर्मों का फल भोगना ही पड़ेगा)।


घटना से भयभीत घर लौटकर उसने सारा विवरण अपने पुत्रों को बताया। वे भी यह सुनकर बहुत दुखी हुए और डरकर कालांतर में वहां से पलायन कर तीन-चार किलोमीटर दूर पहले चौड़ा, फिर नैला में जाकर बस गये। लेकिन उनको शांति नहीं मिली। अनेक प्रकार के कष्टों, दु:खें, महामारियों, गरीबी ने उनका पीछा नहीं छोड़ा। अपने पूर्वजों के साथ घटी घटना से वहां के लोग भलीभांति परिचित थे। ऐसी स्थिति में उन्होंने नैथना देवी की अराधना की और वचन दिया कि भविष्य में उनके गांव की नवप्रसूता गाय का पहला दूध और गांव की फसल के प्रथम अनाज का भोग नैथना देवी को अर्पित करेंगे। तब से लेकर आज तक यह परंपरा निर्बाध रुंप से चल रही है वहां के लोग इस परंपरा का श्रद्धापूर्वक पालन कर रहे हैं।

मंदिर के प्रांगण में प्रतिवर्ष भाद्रपक्ष मास की संक्रान्ति को एक विशाल मेला लगता है जो "घी संक्रान्ति मेले" के नाम से प्रसिद्ध है। जिसमें सुदूर गांवों के लोग हजारों की संख्या में माँ के दर्शन करने आते हैं।

ऐसी भी मान्यता है कि क्षेत्र में भयंकर अकाल पडने पर और महीनों तक वर्षा नहीं होने पर आसपास के गांवों के लोग घड़ों के पानी से देवी की मूर्ति का अभिषेक करते हैं और देवी को अक्षत, तिल, फूल आदि अर्पित करते हैं। इस अभिषेक का परिणाम यह देखा गया है कि इलाके में वर्षा हो जाती है।

अध्यात्म के साधकों को यह स्थान अनेक अलौकिक सिद्धियों को प्राप्त करने का अनुपम स्थान है। यहां योग साधना करने वाले साधु-संतों को दिव्य ऊंर्जा की अनुभूति होती है। मंदिर के गर्भ गृह में ध्यान-मग्न साधक को शक्ति का स्पन्दन अनुभव होता है। मंदिर के चारों ओर सूक्ष्म तरंगों का महाकाश स्पष्ट महसूस होता है। स्वनामधन्य सन्यासी श्री हरनारायण स्वमी जी इन्हीं सूक्ष्म तरंगों से सदैव ओतप्रेत रहते थे।

अध्यात्म के साधकों को कुछ कठोर नियमों का पालन करना पड़ता है। यही कारण है कि नैथना-नौबाड़ा ग्रामों में चारपाई पर सोने पर प्रतिबंध है। "सादा जीवन उच्च विचार" से प्रेरित होकर जमीन पर सोने का नियम है। यहां आने वाला कोई भी व्यिक्त ऐसा नहीं है जिसे आध्यात्मिक शांति न मिली हो।



" नैथना देवी " शक्तिपीठ वैष्णवी शक्ति के रुंप में प्रतिष्ठित है। यहां शुद्ध सात्विक वैष्णव पद्धति से पूजा-अर्चना की जाती है, मांसाहार और बलि प्रथा का एकदम निषेध है। नैथना ग्राम के ग्रामवासी प्रात:कालीन और सायंकालीन पूजा-अर्चना करते हैं। नवरात्र के दिनों में यहां दर्शनार्थियों की भारी भीड़ लगी रहती है। मंदिर के गर्भ गृह से पहले भैरव जी का एक छोटा सा मंदिर है। मंदिर के पास ही यज्ञशाला है जो अपने प्राचीन स्वरुंप में स्थित है। मंदिर के चारों ओर असंख्य घंटियां

लटकी हुई हैं जो इस बात की साक्षी हैं कि शुद्ध मनोभाव से देवी दर्शन करने वालों की मनोकामना अवश्य पूर्ण होती है। नौबाड़ा गांव के श्री नरसिंह रौतेला ने जिनकी उम्र 85 वर्ष से भी अधिक थी, इस ठंडे स्थान में एक वर्ष तक निर्वस्त्र रहकर साधना की। साधना का प्रभाव यह हुआ कि पहले जो उनकी आंखों की दृष्टि चली गई थी, वह वापस आ गई। वे अच्छी तरह से सबको देख सकते हैं।
By पं. भास्कर जोशी
« Last Edit: November 04, 2011, 11:20:52 AM by पं. भास्कर जोशी »
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Re: आ हा रे म्यर गेवाड़
« Reply #7 on: November 11, 2011, 03:52:32 PM »
Thanks for sharing this info with the members
सुखी दुखी जखी रोला त्वे ते नि बिसरोला, तेरो मान सम्मान तेरा गीतू गुन्जोला
देसु परदेसा रे , मेरा गढ़ देसा हे........

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Re: आ हा रे म्यर गेवाड़
« Reply #8 on: November 11, 2011, 03:53:37 PM »
info share karne ke liye dhanyawad joshi ji...
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Offline Prashant Rawat

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Re: आ हा रे म्यर गेवाड़
« Reply #9 on: December 27, 2011, 10:19:27 AM »
Joshi ji aapko dhanyavad is jankari ko share karne k liye..

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Re: आ हा रे म्यर गेवाड़
« Reply #10 on: February 09, 2012, 11:49:44 AM »
नमस्कार यंग उत्तराखंड बोर्ड । यदि मुझसे कोई सहयोग की आवश्यकता होगी तो मैं कोशिस करूँगा । http://myrgewad.blogspot.in/  |उत्तराखंड की सेवा के लिए तत्पर रहूँगा..
 no. 9013843459
har samy uttarakhand ke sewa ke liye...
« Last Edit: April 02, 2012, 12:45:20 PM by पं. भास्कर जोशी »
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Re: आ हा रे म्यर गेवाड़
« Reply #11 on: February 20, 2012, 02:59:03 PM »
नमस्कार यंग उत्तराखंड बोर्ड । यदि मुझसे कोई सहयोग की आवश्यकता होगी तो मैं कोशिस करूँगा । http://myrgewad.blogspot.in/  |उत्तराखंड की सेवा के लिए तत्पर रहूँगा..

NAMASKAR JOSHI JI,
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AAJKAL HAMARE SADASYA YOUNG UTTARAKHAND CINE AWARDS 2012 KI TAIYARIYON ME VYAST HAI, :hello2:
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Re: आ हा रे म्यर गेवाड़
« Reply #12 on: April 02, 2012, 12:41:06 PM »
अपनी जन्मभूमि से बिछड़ने का दुःख
                    गेवाड घाटी अल्मोड़ा चौखुटिया विकास खण्ड में तडगताल, नैगड़, जौरासी, नैथना, मासी तक का पूरा क्षेत्र गेवाड घाटी के अंतर्गत आता है । इसी गेवाड घाटी की मैं अपनी 20 वर्ष की यादों को समेटे हुए हूँ।  अपनी जन्मभूमि को याद कर प्रदेश में रह रहा हूँ । कास वो दिन वो यादें फिर लौट कर आते । बचपन का वो उछल कूद करना इस गांव से उस गाँव तक अपने सखे-मित्रों के साथ घुमने निकलजाना । आज सिर्फ एक यादें ही बसी हुई है । 20  वर्ष तक की आयु तक मैं अपने इस गेवाड घाटी भूमि में रहा । कुछ समय बाद में आपनी रोजी रोटी कमाने के लिए आपनी माँ मेरी जन्मभूमि को छोड़कर प्रदेश के लिए निकल पड़ा । मुझे लगता है जो दुःख मुझे हुआ था अपने घाटी से वह दुःख लगभग सभी ने महशुस किया होगा जो भी आपने घर से निकलकर दूर-दरार शहर को निकले समय । पर मेरी हालत कुछ इस प्रकार थी । जैसे इक बच्चा आपनी माँ की गोद में बहुत समय से खेल रहा हो, माँ को कुछ और कम की याद आये तो अपने बालक को छोड़कर कर जाना । लेकिन यहाँ पर आपनी जन्म भूमि को छोड़कर में जा रहा था । एसा लग रहा था कि जैसे - बालक आपनी माँ बिना रह नहीं सकता । पर मुजबुरी इन्शान से क्या न कराती, इस करण से मुझे भी जाना पड़ा । अपने गांव, आपनी घाटी, अपना पहाड़ छोड़ने का दुःख क्या होता है आप जानते ही होंगे । कुछ समय पश्यात प्रदेश में अच्छा  लगने लगा यहाँ की चकाचौद । कुछ समय गुजर जाने के बाद फिर मुझे आपने गांव की याद माँ की याद आने लगी । मन करता सबकुछ छोड़ कर अपने गांव में ही रहूँ । बार बार मुझे आपनी माँ -पिताजी की दुखों को देखते हुए फिर असमंजस में पड़ जाता हूँ । मैं नयाँ-नयाँ प्रदेश में आया हुआ था । मुझे कुछ भी मालूम नहीं, हर चीज से अनजान था । कुछ समय गुजर जाने के बाद मुझे एक इसे व्यक्ति से मेरी मुलाकात हुई जो मेरी जन्मभूमि गेवाड़ घाटी को बहुत कुछ समझते थे । मुझे बहुत ही प्रसन्नता हुई उन व्यक्ति से मिलकर । बहुत कुछ बताया मुझे गेवाड़ घाटी के बारे में और में भी उत्सुक था जानने के लिए । उन महोदय का मिलना मेरा पाने पहाड़ के प्रति और भी लगाव बढ़ना । जब उन्होंने मुझे अपने गेवाड घाटी के बारे में बताया में एक दम हचक हो गया । उन्होंने मुझे कहा आप के गेवाड घाटी को रंगीलो गेवाड या नवरंगी  गेवाड के नाम से भी जाना जाता है । मैंने पूछा गेवाड घाटी का नाम रंगेलो गेवाड या नवरंगी गेवाड पढ़ा क्यूँ इस के पीछे का क्या इतिहाश रहा है ? फिर मुझे उन्होंने गेवाड घाटी के पूर्व कुछ रहस्य बताए । गेवाड घाटी का नाम रंगेलो गेवाड और नवरंगी गेवाड कैसे पड़ा ?


रंगीलो गेवाड -
                     रंगीलो गेवाड का रहस्य बड़ा ही सुन्दर और दिलचस्प है । ये बहुत ही लोकप्रिय और एक अजर अमर प्रेम कहानी है ।
                             गेवाड घाटी का यह अद्भुत प्रेम कथा आज से लगभग 500 -600 वर्ष  पुरानी है  यहाँ एक समय कत्यूरियों का साम्राज्य हुआ करता था । गेवाड घाटी में 14  राजाओं ने वैराठ राज्य में  राज किया । इसी वंश के अंत में पृथ्वी देवपाल राजा हुए । इन की पहली पत्नी जियारानी से धाम देव और दूसरी पत्नी धर्मा देवी से मालूशाही हुए । मालूशाही को वैराठ का राजा बनाया गया । यहीं से राजुला मालूशाही की अमर प्रेम गाथा का उद्गम हुआ  । मालूशाही  का नाम और एश्वर्य जब चारोँ ओर फ़ैलाने लगा । इसी बिच राजुला का सौन्दर्य भी चारोँ ओर फैलने लगी ।

एक दिन राजुला ने अपनी मां से पूछा कि

” मां दिशाओं में कौन दिशा प्यारी?
पेड़ों में कौन पेड़ बड़ा, गंगाओं में कौन गंगा?
देवों में कौन देव? राजाओं में कौन राजा और देशों में कौन देश?”

उसकी मां ने उत्तर दिया ” दिशाओं में प्यारी पूर्व दिशा, जो नवखंड़ी पृथ्वी को प्रकाशित करती है, पेड़ों में पीपल सबसे बड़ा, क्योंकि उसमें देवता वास करते हैं। गंगाओं में सबसे बड़ी भागीरथी, जो सबके पाप धोती है। देवताओं में सबसे बड़े महादेव, जो आशुतोष हैं। राजाओं में राजा है राजा रंगीला मालूशाही और देशों में देश है रंगीली वैराट”

तब राजुला धीमे से मुस्कुराई और उसने अपनी मां से कहा कि ” हे मां! मेरा ब्याह रंगीले वैराट में ही करना।

"मिकणी बिवाय बाबू, पाली पछाऊं का देश ।

पाली पछाऊं का देश म, रंगेलो गेवाडा ।

रंगीलो गेवाडा म , रंगीलो वेरठा।

मिकणी बिवाय बाबू , रंगेलो गेवाडा । "
« Last Edit: April 10, 2012, 03:19:22 PM by पं. भास्कर जोशी »
पं. भास्कर जोशी

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Re: आ हा रे म्यर गेवाड़
« Reply #13 on: April 02, 2012, 12:50:45 PM »
गेवाड़ घाटी का दर्द कोई क्यूँ नही समझता .........
« Last Edit: April 02, 2012, 12:53:05 PM by पं. भास्कर जोशी »
पं. भास्कर जोशी

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Re: आ हा रे म्यर गेवाड़
« Reply #13 on: April 02, 2012, 12:50:45 PM »